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कुंडली से विवाह का समय कैसे पता करें?

  • Writer: Jarin Kumar
    Jarin Kumar
  • Feb 13
  • 3 min read
Best Astrologer in Rohini
Best Astrologer in Rohini

विवाह जीवन का एक महत्वपूर्ण निर्णय है, और वैदिक ज्योतिष में कुंडली के माध्यम से विवाह का संभावित समय जाना जा सकता है। सही विश्लेषण के लिए ग्रहों की स्थिति, दशा, गोचर और भावों का गहराई से अध्ययन किया जाता है।

प्रसिद्ध ज्योतिष विशेषज्ञ और Best Astrologer in Rohini, ज्योतिषाचार्य राममेहर शर्मा के अनुसार, विवाह का सही समय जानने के लिए केवल एक योग देखना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि संपूर्ण कुंडली का संतुलित विश्लेषण आवश्यक है।


सप्तम भाव (7th House) का विश्लेषण

➤ (क) सप्तम भाव का महत्व

  • यह भाव विवाह, जीवनसाथी और दांपत्य सुख का प्रतिनिधित्व करता है।

  • यदि यह भाव मजबूत है, तो विवाह समय पर होने की संभावना अधिक रहती है।

➤ (ख) सप्तम भाव का स्वामी

  • यदि सप्तम भाव का स्वामी शुभ ग्रहों से प्रभावित हो, तो विवाह जल्दी होता है।

  • पाप ग्रहों (शनि, राहु, केतु) का अधिक प्रभाव हो तो देरी संभव है।

➤ (ग) सप्तम भाव में स्थित ग्रह

  • शुक्र या बृहस्पति का प्रभाव विवाह के लिए शुभ माना जाता है।

  • शनि की उपस्थिति देरी करा सकती है, लेकिन स्थिर विवाह देती है।


शुक्र और बृहस्पति की स्थिति

➤ (क) पुरुष की कुंडली में शुक्र

  • शुक्र विवाह और प्रेम का कारक ग्रह है।

  • मजबूत शुक्र शीघ्र विवाह का संकेत देता है।

➤ (ख) महिला की कुंडली में बृहस्पति

  • बृहस्पति पति का कारक ग्रह है।

  • यदि यह उच्च या स्वराशि में हो, तो विवाह समय पर होता है।

➤ (ग) दोनों ग्रहों की दशा

  • शुक्र या बृहस्पति की महादशा/अंतरदशा में विवाह के योग प्रबल होते हैं।


दशा और अंतरदशा का प्रभाव

➤ (क) महादशा

  • यदि सप्तम भाव के स्वामी की महादशा चल रही हो, तो विवाह संभव है।

➤ (ख) अंतरदशा

  • विवाह अक्सर उस समय होता है जब महादशा और अंतरदशा दोनों विवाह से संबंधित ग्रहों की हों।

➤ (ग) योग सक्रिय होना

  • केवल योग होना पर्याप्त नहीं, सही दशा में उसका सक्रिय होना आवश्यक है।


ग्रह गोचर (Transit)

➤ (क) बृहस्पति का गोचर

  • जब बृहस्पति सप्तम भाव या लग्न पर गोचर करता है, तो विवाह के योग बनते हैं।

➤ (ख) शनि का गोचर

  • शनि स्थिरता देता है, लेकिन कभी-कभी देरी का कारण बन सकता है।

➤ (ग) शुभ गोचर का समय

  • गोचर और दशा का मेल होने पर विवाह की प्रबल संभावना होती है।


विवाह में देरी के संकेत

➤ (क) शनि का अधिक प्रभाव

  • विवाह 30 वर्ष के बाद हो सकता है।

➤ (ख) मंगल दोष

  • देरी या बाधा उत्पन्न कर सकता है।

➤ (ग) राहु-केतु प्रभाव

  • अचानक या असामान्य विवाह परिस्थितियाँ बन सकती हैं।


नवांश कुंडली (D-9 Chart)

➤ (क) नवांश का महत्व

  • विवाह और दांपत्य सुख का गहरा संकेत देता है।

➤ (ख) नवांश में सप्तम भाव

  • यदि यहां शुभ ग्रह हों तो विवाह का समय अनुकूल होता है।


विवाह के संभावित आयु संकेत

  • 18–23 वर्ष: यदि शुक्र मजबूत और सप्तम भाव शुभ हो।

  • 24–28 वर्ष: सामान्य विवाह आयु, यदि योग संतुलित हों।

  • 29–35 वर्ष: शनि या मंगल के प्रभाव से देरी।


निष्कर्ष

कुंडली से विवाह का समय जानने के लिए केवल एक भाव या एक ग्रह देखना पर्याप्त नहीं है। सप्तम भाव, उसके स्वामी, शुक्र-बृहस्पति की स्थिति, दशा-अंतरदशा और गोचर—सभी का संयुक्त विश्लेषण आवश्यक है।

प्रसिद्ध ज्योतिष विशेषज्ञ और Best Astrologer in Rohini, ज्योतिषाचार्य राममेहर शर्मा के अनुसार, विवाह के सटीक समय का निर्धारण करने के लिए संपूर्ण कुंडली का गहराई से अध्ययन करना जरूरी होता है।

सटीक भविष्यवाणी के लिए अनुभवी ज्योतिषी से विस्तृत परामर्श लेना चाहिए, ताकि ग्रहों की वास्तविक स्थिति और विवाह का उपयुक्त समय स्पष्ट रूप से जाना जा सके।



 
 
 

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